आज की पीढ़ी के बहुत कम लोग यह जानते हैं कि गाजीपुर में १८५७ की क्रांति का बिगुल निहत्थी जनता ने फूंका था। देशी सिपाहियों ने आजादी के इस युद्ध में भाग नहीं लिया था। यहां की जनता के सामने सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि यहां कोई ऐसी रियासत नहीं थी, जिसके झंडे के नीचे वे एकत्र हो सके। हालांकि दानापुर, आरा, आजमगढ़ तथा बनारस की छावनियों में देशी सिपाहियों ने विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया था। नौकरियों से निकाले जाने के बाद वे और खतरनाक हो गए तथा अपने अपने क्षेत्र में अंग्रेजों के अड्डों पर आक्रमण करने लगें।
गाजीपुर जनपद में तब तीन बड़े जमींदार थे, लेकिन उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। शायद इसी वजह से वे हेस्टिंग की सेवा करते रहे। गाजीपुर अंग्रेज सैनिकों का एक प्रमुख अड्डा था। बिहार, प्रयाग तथा अवध की सीमा यहां से नजदीक होने की वजह से अंग्रेज सैनिकों को सुरक्षित तरीके से यहां रखा जाता था। यहां के अंग्रेज कलेक्टर मि० मैथ्यू ने प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने के लिए सुरक्षा का मजबूत द्घेरा बना लिया था। सरकारी चीजें अफीम की कोठी में सैनिक मोर्चेबंदी में रख दी गई और खजाना सौ सैनिकों की निगरानी में बनारस भेज दिया गया। इसके बाद मद्रास से सैकड़ों सैनिक बुलाकर अफीम की कोठी में नियुक्त कर दिया गया। अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित एक स्टीमर गंगा की धारा पर सुरक्षा के लिए द्घूमा करती थी। दूसरी ओर २ जून १८५७ को आजमगढ़ से झुंड के झुंड विद्रोही गाजीपुर में प्रवेश करने लगे और दो तीन दिनों के अंदर यहां की जनता ने विदेशियों के अड्डों पर हमला करना शुरू कर दिया। १५ जून तक जिले में फौजी कानून लागू कर दिया गया। अंग्रेजों के इतने सख्त इंतजाम के बाद भी जनता का साहस दृढ़ था।
गाजीपुर सदर तहसील के चौरा गांव की जनता ने अफीम की करस लेने वाले अंग्रेज कलेक्टर मि० मैथ्यू की कोठी लूट ली गयी और उसके कारोबार को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया गया। यहीं स्थिति मुहम्मदाबाद तथा सैदपुर तहसील के अंग्रेज कोठीदार तथा व्यापारियों की हुई। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अंग्रेजों की एक भी कोठी बिना लूट फूंक के नहीं छोड़ी गई। खेतिहरों ने माजगुजारी देना बंद कर दिया और सरकारी गुमास्ते गांव छोड़कर केन्द्र में आ छिपे। सैकड़ों की समूह में जनता अंग्रेजों तथा उनके देशी सहयोगियों के ठिकानों पर हमला करती और उसे नष्ट कर देती थी। केन्द्र से भेजी गई टुकड़ियां गांवों को तहस-नहस करतीं और बिना सुबूत व गवाही के नेताओं पर नाना प्रकार के अत्याचार करती थी।
इतिहासकार कृष्णानंद राय ने अपने संस्मरण में लिखा है कि बिहार के शाहाबाद (अब भोजपुर) के कुंवर सिंह की धाक निकटवर्ती जिलों में जम चुकी थी। उनका नाम लेने से लोगों में देश के लिए प्राण उत्सर्ग करने की अभिलाषा जाग उठती थी। वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छत्र नेता थे। गाजीपुर में क्रांति की लहर तेज हो गई। कुंवर सिंह की एक छोटी सी फौज की टुकड़ी ने केन्द्रीय खजाने पर आक्रमण कर दिया और बहुत से कागजात आदि लूटकर उन्हें जला दिया। गहमर के लोगों ने अंग्रेजों के विरुद्ध मजबूत मोर्चा स्थापित कर दिया। कुंवर सिंह की सेना में बहुत से युवक अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। उनकी वीरता की कहानियों ने गांव की जनता को हथियार उठाने पर विवश कर दिया था। विद्रोहियों का नेतृतव मेंगूर राय कर रहे थे। उनकी अपनी टोली थी, जो जमानियां क्षेत्र से अंग्रेज सैनिकों को भगाया करती थी। अंग्रेज मेंगूर राय से भयभीत रहते थे। इस युद्ध में जमानियां के पठानों का भी एक विशेष स्थान है। उन्होंने सामूहिक रूप से अपने क्षेत्र में विद्रोह कर, खुद को अंग्रेजों से स्वतंत्र द्घोषित कर दिया।
हालांकि उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। उनकी जमीनें जबरन छीनकर नीलाम कर दी गई। आजमगढ़ को फिर से कब्जा करने के लिए १६ जून १८५७ को सरकार द्वारा गाजीपुर में फौज भेजी गई। १० अगस्त १८५७ को और अंग्रेज सैनिक बुलाए गए। उनकी सहायता के लिए देशी सैनिकों को निःशस्त्र रखा गया। क्योंकि अंग्रेज हिन्दुस्तानियों पर विश्वास नहीं करते थे। वीर कुंवर सिंह आजमगढ़ से जगदीशपुर लौट रहे थे। बलिया (उन दिनों गाजीपुर में) में गंगा पार करते समय अंग्रेजों की गोली से उनकी बांह लहूलुहान हो गये। उन्होंने जख्मी हाथ को तलवार से काटकर गंगा में अर्पित कर दिया। यह चोट उनके लिए धातक सिद्ध हुई और अपने जन्मभूमि पहुंचकर उन्होंने प्राण त्याग दिया। इस द्घटना से गाजीपुर और जगदीशपुर की जनता आक्रोशित हो उठी। जमानियां में सरकारी तथा विदेशियों की इमारें लूट कर फूंक दी गई। अंग्रेजों से संबंधित लोगों, स्थानों पर हमले किए गए और अनेक को जान से मार डाला गया। यहां की जनता का उत्साह देखकर अंग्रेज दहल गए।
कुंवर सिंह के निधन के बाद जगदीशपुर अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। गाजीपुर के जवान जो कुंवर सिंह की सेना में थे, नेतृत्वहीन हो गए और अपने द्घर लौट गए और अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े हुए। स्थिति बिगड़ते देखकर बनारस से विशेष फौज बुलाई गई और क्रांतकारियों का दमन करने के लिए गांव-गांव में फौज की टुकड़ियां द्घूमने लगी। मद्रास केवेलरी को दो रेजीमेंट कर्नल कंवरलेज के नेतृत्व में यहां पर काम कर रही थी। फिर भी स्थिति उनके काबू के बाहर थी। जमानियां के लोग तो अंत तक अंग्रेजों के विरूद्ध शस्त्र का प्रयोग करते रहे। मेजर हैवलाक द्वारा अमर सिंह को हराने के बाद अंग्रेज शाहाबाद तथा गाजीपुर की जनता पर हावी हो गए। कुंवर सिंह के मरने से जनता के पैर पहले ही उखड़ चुके थे। अमर सिंह की हार से इन जिलों के लिए आशा का दीपक ही बुझ गया था।
अक्टूबर १८५७ में जाफर शाहाबाद तथा गाजीपुर में शांति स्थापित हुई। गाजीपुर में १८६२ तक अंग्रेजों की छावनी कायम रही, बाद में संभवतः फौज हटा ली गई और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अंग्रेजों के विरूद्ध हुए विद्रोह की आग स्वतंत्रता मिलने के बाद ही शांत हुई। (हिफी)