बेटे भले ही एहसान फरामोश हो जाएं लेकिन राजनीतिज्ञों ने अपने-अपने बेटों को राजनीतिक मंच देने का भरपूर प्रयास किया है। इसके चलते कई का राजनीतिक जीवन ही खतरे में पड़ गया। राजनीति में भाई-भतीजावाद का आरोप पहले महत्व रखता था लेकिन अब तो साफ-साफ कहा जाने लगा है कि ''जब डाक्टर का बेटा डाक्टर और इंजीनियर का बेटा इंजीनियर हो सकता है तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं हो सकता।'' सच्चाई भी यही है कि यदि कोई राजनेता अपने उत्थान काल में ही बेटे-बेटियों को प्रभावशाली पद तक पहुंचाता है तो इसमें अनुचित क्या है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपने बेटे राजवीर की खातिर यदि भाजपा छोड़ दी तो इसे उसी श्रृंखला की एक कड़ी समझना चाहिए। आजादी के बाद से पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर केरल के के.करुणाकरन तक यही करते रहे हैं। इससे कई गतिशील चेहरे जैसे उमर अब्दुल्ला, राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.करुणानिधि के बेटे स्टालिन, शीला दीक्षित के पुत्र सांसद संदीप दीक्षित तक का उल्लेख किया जा सकता है।
भारतीय राजनीति में यह युवाओं का युग कहा जा सकता है। अरसे तक श्रीमती सोनिया गांधी ने अपने बेटे राहुल गांधी को राजनीति में सक्रिय भागीदारी से परहेज किया लेकिन कांग्रेसजनों की बेहद मांग और परिस्थितियों को देखते हुए राहुल को पांच वर्ष पूर्व संसदीय चुनाव में उतारा गया। उन्हें अपने पिता स्व. राजीव गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी की बागडोर सौंपी गयी।
धीरे-धीरे उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया और उन्हें देश की परिस्थितियों को गंभीरता से अध्ययन करने का मौका मिला। भारत भ्रमण और रोड शो जैसे कार्यक्रम करते-करते राहुल गांधी ने जब गांवों में रात्रि विश्राम और दलितों के द्घर भोजन करने का कार्यक्रम शुरू किया तो उत्तर प्रदेश में बसपा के कान खड़े हो गये। उसी समय से उसने कांग्रेस से दूरी बढ़ानी शुरू कर दी। हालांकि बसपा की नेता और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने स्वयं द्घोषित कर रखा है कि उनका उत्तराधिकारी कोई दलित ही होगा और वह उनसे १४ वर्ष उम्र में छोटा है। इससे जाहिर है कि वे भी युवाओं को ही राजनीति में आगे लाना चाहती हैं। पिछले विधान सभा चुनाव में उन्होंने कई युवाओं को अवसर भी दिया।
भाजपा में अभी भी कई विसंगतियां हैं। एक तरफ मार्ग दर्शन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संद्घ करता है जो अनुभवी राजनीति का समर्थक है। उसके सर संद्घ प्रमुख ज्यादातर बुजुर्ग ही हैं। उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा में भी वरिष्ठता को महत्व दिया जाता है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसी के चलते प्रधानमंत्री बने और अब श्री लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार द्घोषित किया गया है। इस बीच अपेक्षाकृत कम बुजुर्ग श्री राजनाथ सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये गये और उनकी पीढ़ी के कई नेताओं को लगा कि अब उनकी पारी खत्म हो रही है तो बेटों को आगे बढ़ाया जाए। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर विधान सभा का चुनाव जीत चुके हैं। भाजपा के साथ श्री कल्याण सिंह के विरोध हो गया, यह बात समाजवादी पार्टी भी जानती थी। इसलिए उन्हें संकेत पहुंचाया गया है कि सपा के दरवाजे उसके लिए खुले हैं। गत दिनों नई दिल्ली में बताते हैं श्री मुलायम सिंह यादव और श्री कल्याण सिंह की वार्ता हुई और वार्ता का प्रतिफल यह निकला कि कल्याण ने मुलायम से नजदीकी और हाल-फिलहाल सपा से दूरी रखकर अपने बेटे को समाजवादी पार्टी से जोड़ दिया। कल्याण सिंह ने राजवीर को सपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर अखिलेश यादव की युवा लॉबी को मजबूत कर दिया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह पर भी यह आरोप लगता है कि वे अपने बेटे को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक दबाव डाल रहे हैं। वे अपने बेटे को भाजपा में ही आगे बढ़ाएंगे।
इस प्रकार बेटों को आगे बढ़ाने में दो प्रकार के राजनीतिक सामने आ रहे हैं। एक वे हैं जो पुत्र मोह में पार्टी के हित को भी नजरंदाज करते हैं। इनमें केरल के वयोवृद्ध नेता के०करुणाकरन का नाम लिया जा सकता है। श्री करुणकरन ने अपने बेटे मुरलीधरन को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस को दो टुकड़ों में बांट दिया। उन्होंने अपनी अलग पार्टी भी बनायी लेकिन केरल की जनता ने उसे मान्यता नहीं दी। इतना जरूर हुआ कि केरल में कांगे्रस नेतृत्व वाला लोकतांत्रिक मोर्चा चुनाव हार गया और सत्ता वाममोर्चे के पास चली गयी। बाद में श्री करुणाकरन को पुनः सद्बुद्धि आयी और वे कांग्रेस में शामिल हो गये। इस प्रकार बेटे के हितों को महत्व देकर उन्होंने पार्टी हितों को नजरंदाज किया। इसी प्रकार का रवैया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने भी अपनाया। उन्होंने अपने बेटे की खातिर ही इराक से तेल के बदले खाद्यान्न योजना में अनुचित समझौते किये और जब कांग्रेस से निकाला गया तो बसपा से जुड़ गये। बसपा में भी अपने बेटे को राज्यसभा की सीट दिलाने के लिए अड़ गये और वहां से भी निकाले गये। उन्होंने अपने बटे को राजनीतिक मंच देने की कोशिश भरपूर की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
इसी क्रम में एक और असफल नेता कर्नाटक के श्री एचडी देवगौड़ा भी कहे जा सकते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने राजनीति में धर्म निरपेक्षता का सिद्धांत अपनाते हुए जद (यू) से इसीलिए किनारा किया था कि वह केन्द्र में भाजपा के साथ राजग में शामिल था। उसी भाजपा के सहयोग से उनके बेटे कुमार स्वामी देवगौड़ा ने जब सरकार बनायी तो श्री एचडी देवगौड़ा खामोश रहने के अलावा और कुछ नहीं कर सके। वे भी अपने बेटे को राजनीति में आगे बढ़ते देखना चाहते थे लेकिन रास्ता गलत हो गया। नतीजा यह हुआ कि बाद में भाजपा से भी उनके रिश्ते खराब हो गये और विधान सभा चुनाव में जद (एस) अकेली पड़ गयी। भाजपा ने अपने दम पर सरकार बना ली। श्री देवगौड़ा के बेटे का राजनीतिक रथ भी तीव्र गति से दौड़ने के बाद एकाएक थम गया है।
इसके विपरीत राजनीति में जिन शहजादों के सितारे चमके हैं उनमें सबसे पहले डा० उमर अब्दुल्ला का नाम लिया जा सकता है। उन्हें राजनीति भले ही अपने पिता डा० फारुख अब्दुल्ला से मिली हो लेकिन उनकी सोच बहुत साफ सुथरी है। इसीलिए अभी हाल में हुए जम्मू-कश्मीर के विधान सभा चुनाव में जब नेशनल कांफ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो पहले डा० फारुख अब्दुल्ला ही मुख्यमंत्री बनने वाले थे लेकिन कांग्रेस से सलाह-मशविरा के बाद उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री की कुर्सी दे दी गयी। अपने पिता की राजनीतिक विरासत सफलतापूर्वक संभालने वालों में शाहजहांपुर के पूर्व सांसद और तत्कालीन प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार रहे जितेन्द्र प्रसाद के बेटे जितिन प्रसाद का उल्लेख किया जा सकता है। वे वर्तमान में केन्द्रीय राज्यमंत्री हैं और राजनीतिक छवि भी अच्छी है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश के स्व० माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल की शोभा बढ़ा रहे हैं और राज्य के प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। राजस्थान के पूर्व नेता राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट अभी मंत्रिमंडल तक नहीं पहुंच पाये लेकिन उनके तेवर भी बहुत जुझारू हैं।
अभी हाल में दो और शहजादे राजनीति के शिखर की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं। इनमें एक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के बेटे स्टालिन। इनका नाम जरूर भयंकर लगता है लेकिन विचारों से बहुत सहृदय हैं। तमिलनाडु में वे नरमपंथी राजनीति के समर्थक बताये जाते हैं और श्री करुणानिधि उन्हें भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे देखना चाहते हैं। दूसरा उदयमान चेहरा पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखवीर का है। श्री सुखवीर पर पूर्ववर्ती कांगे्रस की सरकार में कई आरोप लगे थे लेकिन जनता ने उन्हें नेतृत्व सौंपा है। हाल ही में श्री प्रकाश सिंह बादल ने सुखवीर को उपमुख्यमंत्री बनाने की द्घोषणा कर दी। इस प्रकार वर्तमान राजनीति में युवाओं की भरमार है और उनसे साथ-सुथरी राजनीति की अपेक्षा भी की जा रही है। लगता है भविष्यय युवाओं के हाथों में है शायद इसी का प्रमाण है कि अमेरिका में सबसे कम उम्र के ओबामा का राष्ट्रपति के पद पर पहुंचना विश्व के युवाओं को प्रेरणादायी है। (हिफी)