भारत को विश्व गुरु का खिताब यूं ही नहीं दिया गया था। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं जिनकी प्रासंगिकता आज भी है। सादा जीवन उच्च विचार का दर्शन वर्तमान आर्थिक मंदी और विशेष रूप से सूचना तकनीक के बढ़ते प्रभाव में सबसे ज्यादा समीचीन लगता है। इस तकनीक ने दुनिया भर को बड़ी तेजी से अपनी जकड़न में ले लिया। ऊपरी तौर पर देखने में यह तकनीक बहुत लुभावनी है लेकिन इसके जाल में हम सभी बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। अभी हाल में भारत के कम्प्यूटर क्षेत्र के चौथे सबसे बड़े संस्थान सत्यम कम्प्यूटर्स कार्पोरेशन में आये भूचाल से पता चला कि यदि इसकी सेवाएं ठप हो गयीं तो सिंगापुर जैसे देश में मंत्रियों से लेकर संत्रियों तक को वेतन नहीं मिल पाएगा। क्योंकि उनकी पगार के साफ्ट वेयर इसी कम्पनी के कम्प्यूटरों में फीड है। ऐसी दशा कई और देशों की भी है। सूचना तकनीक पर आधारित कई कार्य इसके फेल होने पर एकदम ठप हो जाते हैं। रेलवे की आरक्षण प्रणाली, अखबारों का पूरा कामकाज और अर्थ व्यवस्था का बहुत बड़ा ढांचा पंगु हो जाता है। टेलीफोन, बिजली के बिल जमा करने के लिए लाइन लगाने वालों को जब यह पता चलता है कि सर्वर डाउन हो गया तो उनको निराश होकर लौटने के अलावा और कोई चारा ही नहीं रहता। इससे यही साबित होता है कि हम तकनीक के अपने ही बुने जाल में बुरी तरह उलझ चुके हैं और इससे न सिर्फ हमारे हाथ-पैर कट गये हैं बल्कि आर्थिक बोझ भी बढ़ा है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि वर्तमान में आर्थिक संकट अभी भी जीवन की मूलभूत जरूरतों को प्रभावित नहीं कर सका है लेकिन दिखावे की चीजों ने हर आदमी की कमर तोड़ दी है। आटा, चावल, दाल, तेल, और सब्जी की मांग पहले जितनी थी उतनी ही आज भी है। सामान्य पांच-छह लोगों के परिवार में आज भी दो हजार रुपये में राशन आ जाता है जो महीने बाद भी बचता ही है। मेहमानों के आने पर भी उसमें कमी नहीं आती लेकिन इतनी ही संख्या के परिवारों का महीने में कुल खर्च १०-१२ हजार रुपये बैठता है। यह खर्च गैर जरूरी चीजों पर होता है। इसका सीधा सा मतलब है कि हम अपनी गैर जरूरत की चीजों फिजूल में पांच गुना ज्यादा खर्च कर रहे हैं। अर्थ व्यवस्था के विशेषज्ञ भी कहते हैं कि जो दैनिक उपयोग की वस्तुएं हैं और जिन्हें उद्योग का दर्जा प्राप्त है, वे आर्थिक संकट से बाहर हैं। वास्तव में जिसे मंदी या आर्थिक संकट कहा जा रहा है, वह बैंकों द्वारा दिये जा रहे बड़े कर्जों में है इसलिए उसकी ब्याज दरें द्घटाने की बात की जाती है। आवासों के निर्माण को उद्योग के रूप में बदलने के बाद यह संकट खड़ा हुआ है इसीलिए भवन निर्माताओं से मकान सस्ते करने की अपेक्षा की जाती है। दुपहिया और चार पहिया वाहनों की बढ़ती भीड़ ने आर्थिक मंदी को बढ़ाया है, इसीलिए उन्हें वित्तीय मदद देकर संकट कम किया जा रहा है। महंगाई के बोझ का ढिंढोरा पीटने वाले कभी नहीं कहते कि उनका काफी धन मोबाइल पर बात करने में खर्च हो रहा है। मोबाइल की महत्ता को स्वीकार करते हुए भी उसके दुरुपयोग से इंकार नहीं किया जा सकता। इस क्षेत्र में तेजी से जो बदलाव आ रहे हैं, उसके कचरे का बड़ा ढेर भी इकट्ठा हो रहा है। विभिन्न कंपनियां नये से नया ब्रांड निकालती हैं और पुराना कूड़े के ढेर में चला जाता है। इन सबके बीच जकड़न भी बढ़ती जाती है।
समस्या तब खड़ी होती है जब कोई कंपनी बैठ जाती है या दिवालिया हो जाती है। भारत की 'सत्यम' का ढिंढोरा कुछ ज्यादा ही पिट गया है। इसका कारण है कि १६ देशों में इसका कारोबार है और कई देशों की अर्थ व्यवस्था इसी में कैद है। विदेशों में भी कई बड़ी कंपनियां हिचकोलें खा रही हैं। अभी हाल में अमेरिका की सबसे बड़ी टेलीफोन उपकरण निर्माता कंपनी नौर्टल ने हाथ-पांव ढीले कर दिये और दिवालिया द्घोषित कर दी गयी। इस कम्पनी का मुख्यालय कनाडा की राजधानी में है और एशिया, यूरोप, मध्य पूर्व तथा लैडिन अमेरिका तक उसकी पहुंच है। एशिया में भारत, चीन, ताइबान, हांगकांग, जापान, सिंगापुर, थाईलैण्ड, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड जैसे देश इसके ग्राहक हैं। इस कंपनी के दिवालिया होने से इन सभी देशों को झटका लगेगा। इतने झटके लगने के बाद भी कोई यह नहीं सोचता कि अन्य उत्पादन कैसे बढ़े और दूध-द्घी की नदियां कैसे बहेंगी इसके स्थान पर आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा में दूध जैसे अमृत तत्व को भी विषैला कर दिया गया है। (हिफी)