राजा-महाराजाओं के समय में गद्दी हथियाने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र किये जाते थे। गुप्तकाल में और विशेषकर चंद्रगुप्त मोर्य के राजा बनने पर उनके महाआमात्य (महामंत्री) चाणक्य ने विषकन्याओं का जो प्रयोग शुरू किया था, वह नये-नये रूप धारण करता चला गया। राजाओं का समय था तो खून बहता था लेकिन किसने बहाया इसे कोई नहीं देख पाता था। लोकतंत्र आ गया है तो खून की जगह कुर्सी गिरायी जाती है और कभी-कभी बैठने से पहले ही खींच ली जाती है, लेकिन इन हाथों को कोई नहीं देख पाता। यह राजमहली षड्यंत्र राजनीति की नैतिकता को पूरी तरह समाप्त करने की एक महामारी बनता जा रहा है। इस वर्ष संसद के चुनाव होने हैं और कांग्रेस जहां यूपीए के नेतृत्व में पुनः सरकार बनाने के लिए जोरदार किलेबंदी कर रही हैं, वहीं उससे केन्द्र की सत्ता छीनने के लिए भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ मजबूत मोर्चेबंदी में लगा है। दोनों की असली समस्या राजमहली षडयंत्र है जो बड़ी खामोशी से हो रहा है।
सबसे पहले हम भाजपा की बात करें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संद्घ की राजनीतिक शाखा जनसंद्घ ने पक्के अनुयायी पैदा किये और उनके लिए शिखर नेतृत्व का निर्णय ही सर्वोपरि होता था। उस समय न तो किसी को हाफ पैण्ट पहनने में शर्म लगती थी और न डण्डा लेकर चलने में। पार्टी के निर्णय पर कोई मीन-मेष इसलिए नहीं निकलता था कि वह प्रबुद्धजनों का सोचा-विचारा फैसला है। जनसंद्घ से भाजपा बनी यह पार्टी धीरे-धीरे अपनी परम्परा भूल गयी। इतना ही नहीं अब अपने नेतृत्व के निर्णय पर खुलकर विरोध और पार्टी से अलग होने तक के फैसले लिये जाते हैं। मुख्यमंत्री बनने के समय किसी वरिष्ठता का ध्यान नहीं रखा जाता तो केशूभाई पटेल और नरेन्द्र मोदी, भुवनचंद्र खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी, अर्जुन मुण्डा और बाबूलाल मराण्डी और मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा टकरा जाते हैं। इतना ही नहीं सरकार बनने और मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद भी अंदर ही अंदर आग जलती रहती है। हस्ताक्षर अभियान चलते हैं। इस तरह की लड़ाई मुख्यमंत्री पद तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि प्रदेश अध्यक्ष और दूसरे महत्वपूर्ण पदों के लिए भी लगातार होती रहती है।
इसलिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार (द्घोषित) श्री लालकृष्ण आडवाणी की इन दिनों उपेक्षा हो रही है तो सामान्य लोग आश्चर्य नहीं करते। उपेक्षा करने वालों में जो नाम गिनाये जा रहे हैं, दरअसल उनके पीछे भी कई नाम छिपे हैं और वहीं असली मोहरे हैं। श्री लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बहुत सोच समझकर द्घोषित किया गया है। यदि श्री अटल बिहारी वाजपेयी स्वस्थ होते तो श्री आडवाणी को शायद यह मौका भी न मिलता। ऐसा नहीं कि श्री आडवाणी को इससे कष्ट नहीं हो रहा था लेकिन वे संद्घ के तपेतपाये नेता हैं और संद्घ के फैसले को आंख मूंदकर मानते हैं। वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की तरह नहीं कि कह दिया, भाजपा आरएसएस का निर्देश मानने के लिए बाध्य नहीं है। श्री आडवाणी को उनकी पार्टी के प्रति की गयी सेवा का यह प्रतिफल दिया जा रहा है। इसे कैसे भुलाया जा सकता है कि रामजन्म भूमि आंदोलन के समय श्री आडवाणी की रथयात्रा ने ही भाजपा का पांसा पलटा था और उसके बाद पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
यह बात उन भाजपाइयों को अच्छी नहीं लग रही जो सिर्फ स्वार्थ के चलते राजनीति में कूदे हैं। हालांकि इनमें कई वरिष्ठ भाजपा नेता हैं और संद्घ से जुड़े रहे हैं लेकिन आरएसएस भी तो उसी बीमारी का शिकार हो चुका है। श्री बलराज मधोक, श्री गोविन्दाचार्य और सुब्रमण्यम स्वामी और अब कल्याण सिंह जैसे नेताओं का भाजपा से किनारा करना यही संकेत देता है। वैसे असंतुष्टों की जमात में कई हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत यदि प्रधानमंत्री बनने की इच्छा व्यक्त करते हैं तो इसमें अनुचित जैसा कुछ नहीं है। उन्होंने पार्टी के कहने पर उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था जबकि जानते थे कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के समीकरण उन्हें जीतने नहीं देंगे। अपने राज्य राजस्थान में उन्होंने पार्टी के निर्णयानुसार वसुंधरा राजे का समर्थन किया था। अब वे भी बुजुर्ग हैं और यह कहने में संकोच नहीं होता कि श्री आडवाणी की अपेक्षा वे ज्यादा बूढ़े लगते हैं। अभी हाल में एक पत्रकारवार्ता के दौरान किसी पत्रकार ने उनसे यह पूछ भी लिया कि क्या राजनीतिज्ञों की भी रिटायरमेंट की कोई उम्र होनी चाहिए। इस सवाल पर श्री शेखावत उसी तरह झुंझलाए थे जैसा सच्चाई का सामना करते हुए कोई नेता झुंझलाता है। बहरहाल श्री शेखावत के पीछे भी कई हाथ हैं। यह बात अलग है कि उनके अपने अलग स्वार्थ हैं और वे शेखावत को माध्यम बनाना चाहते हैं।
ऐसे ही एक हाथ हैं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह। पार्टी ने उनकी नाराजगी दूर करने के लिए ही उनकी पसंद की उम्मीदवार कुसुम राय को राज्यसभा का टिकट दिया। इसके बावजूद वे खुश नहीं हुए। श्री कल्याण सिंह का मुख्यगढ़ उत्तर प्रदेश ही है और वह भी पश्चिमी प्रदेश। यहां पर वे अपनी रणनीति से ही भाजपा को चलाना चाहते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजित सिंह का प्रभाव है और भाजपा को उनसे गठबंधन होने पर श्री कल्याण सिंह के समर्थक विधायक कम हो जाएंगे। इसलिए वे इस गठबंधन का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा भाजपा ने बुलंदशहर से अशोक प्रधान को टिकट दिया जबकि वे यहां से अपने बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते थे। इन्हीं सब कारणों से श्री कल्याण सिंह भैरों सिंह शेखावत का समर्थन कर रहे हैं और कहते हैं कि श्री शेखावत ने पार्टी में भ्रष्टाचार की जांच कराने की मांग उठाकर ठीक काम किया है। ध्यान रहे कि दिल्ली में पार्टी के कोष से एक करोड़ रुपये रहस्यमय तरीके से चोरी हो गये हैं जबकि संगठन की टीम श्री आडवाणी की समर्थक है। श्री शेखावत ने राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया पर २२ हजार करोड़ रुपये के द्घोटाले के आरोप की जांच मुख्यमंत्री अशोक गहलौत से कराने की मांग की है। श्रीमती वसुंधरा राजे पर यह आरोप भी कांगे्रस ने ही लगाया है।
दरअसल, पीएम इनवेटिंग पर अब हमले इसलिए तेज हो रहे हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव सिर पर आ गये हैं। श्री आडवाणी के विरोधी इस मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मोहरा बना रहे हैं। इसके लिए तैयारी बहुत पहले से चल रही है। एक समय जब गुजरात में दंगे हुए और दंगे के आरोपितों पर मुकदमा चल रहा था तो भाजपा के ही कई लोग श्री मोदी को कुर्सी से हटाने का अभियान चला रहे थे। अब अचानक वहीं लोग मोदी की तारीफों के पुल बांधने लगे हैं। श्री नरेन्द्र मोदी को सफल मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के योग्य बताया जा रहा है। श्री भैरो सिंह शेखावत और कल्याण सिंह के अलावा कई उद्योगपतियों को भी इस मुहिम से जोड़ लिया गया है। रिलायंस समूह के श्री मुकेश अम्बानी, जिन्हें अभी तक कांग्रेस के खेमे का समझा जाता था, वे भी नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं। इसी प्रकार स्टील किंग सुनील मित्तल भी श्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं।
राजनीतिज्ञों के साथ व्यापारियों की यह दिलचस्पी क्यों हैं इस बारे में भी तरह-तरह की चर्चाएं है। सामान्य रूप से तो यहीं कहा जाता है कि इन उद्योगपतियों के गुजरात में व्यापारिक हित हैं और वे श्री नरेन्द्र मोदी का यशोगान नहीं करेंगे तो उनका नुक्सान हो सकता है। व्यापारी के लिए सबसे अहम उसका धंधा ही होता है। कोइ नृप होइ हमै का हानी .... की तर्ज पर वे अपना काम करते हैं। दूसरी तरफ कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कांगे्रस की सोची समझी चाल है और व्यापारी उसके मोहरे हैं। नरेन्द्र मोदी और आडवाणी के बीच मतभेद बढ़ाकर भाजपा को कमजोर करने का एक तरीका यह भी है। (हिफी)