रांची। बिहार के जिस खनिज सम्पदा से सम्पन्न भू-भाग को विकसित करने और वहां के आदिवासियों को सामाजिक रूप से सम्पन्न करने का जो सपना झारखण्ड बनाते समय देखा गया था, वह पता नहीं कहां खो गया है। राजनीतिक अस्थिरता के भंवर में फंसा यह राज्य अपनी स्थापना के बाद से आठ साल में आधा दर्जन मुख्यमंत्री बना चुका है। १९ जनवरी को राष्ट्रपति शासन लगाकर विधानसभा निलम्बित कर दी गयी जब शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा चुनाव में पराजय का सामना किया और नैतिकता के कारण नहीं बल्कि कांग्रेस के दबाव के चलते मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। अभी विधानसभा भंग नहीं की गयी है। इसलिए जोड़-तोड़ की संभावना बनी हुई है।
श्री शिबू सोरेन अपनी ही विरादरी के नेता से पराजित हुए जब कि वे कुछ दिन पहले ही आदिवासियों के एक सम्मेलन में विश्व गुरु का खिताब प्राप्त कर चुके हैं। उप मुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री बनने नहीं देना चाहते। श्री सोरेन ने जिस महिला को अपना उत्तराधिकारी बनाने की जिद पकड़ी उसे कोई दूसरा नेता स्वीकार नहीं कर रहा है। राज्यपाल सिप्ते रजी ने इसीलिए गत १६ जनवरी को ही राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज दी थी कि राज्य में वैकल्पिक सरकार की कोई संभावना नहीं दिख रही है। मजे की बात यह कि विपक्षी दल भाजपा और उसका संगठन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनाने में कोई रुचि नहीं दिखा रहा है। श्री सोरेन इस्तीफा देने के बाद १० दिन तक जब कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहे तो दिल्ली को भी यही लगा कि अब वहां राष्ट्रपति शासन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। झारखण्ड के मामले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता और केन्द्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव अपना विशेषाधिकार समझते हैं। उन्हीं की मर्जी से पिछली बार मधुकोड़ा को मुख्यमंत्री बनाया गया था लेकिन इस बार उनका भी फार्मूला काम नहीं कर रहा है।
सरकार की अस्थिरता का फायदा नक्सलवादी जैसे अराजक तत्व उठा रहे हैं क्योंकि नौकरशाही, जिसमें पुलिस भी शामिल हैं, भी उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं। गत १७ जनवरी को ही माओवादियों ने द्घात लगाकर एक जीप पर हमला किया और पांच पुलिस कर्मियों समेत सात लोगों की हत्या कर दी। झारखण्ड के नेताओं को इस बात की कोई चिंता नहीं दिखती, उन्हें तो सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी का खेल दिख रहा है। (हिफी)